अधिक पैदावार देने वाली कपास की कौन-कौन सी किस्में है एवं क्या है कपास की खेती (Desi Cotton Sowing) का पूरा गणित लिए जानते हैं..
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Desi Cotton Sowing | देसी कपास की बुवाई का समय शुरू हो चुका है। अच्छी पैदावार के लिए किसानों को वैज्ञानिक तरीके अपनाने चाहिए। जिन खेतों में जड़ गलन (रूट रॉट) की समस्या रहती है, उनमें बुवाई से पहले उचित प्रबंधन ज्यादा जरूरी है।
ऐसे खेतों में 6 किलोग्राम जिंक सल्फेट (व्यापारिक ग्रेड) प्रति बीघा की दर से मिट्टी में मिलाने से पौधों की प्रारंभिक वृद्धि सुदृढ़ होती है तथा रोगों की आशंका कम रहती है। कपास की उन्नत किस्में (Desi Cotton Sowing) कौन-कौन सी है एवं खेती के दौरान किन बातों का ध्यान रखने से अच्छी पैदावार होगी आईए जानते हैं..
कपास की उन्नत, प्रमाणित किस्में
Desi Cotton Sowing | कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक कपास की उन्नत, प्रमाणित किस्मों में आरजी-8, आरजी-18, एच.डी. 123, आर. जी. 542, एफ. डी. के. 124, राज तथा डी. एच. 9 शामिल है। यह कपास की अच्छी उपज देने वाली किस्में है।
कपास की बुवाई में बीज की मात्रा | Desi Cotton Sowing
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक देसी कपास के बीज की मात्रा करीब 3 किलोग्राम प्रति बीघा रखनी चाहिए। बीज उपचार के रूप में ट्राइकोडर्मा हरजेनियम या स्यूडोमोनास फ्लुओरेसेन्स 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपयोग करना चाहिए। इससे रोग नियंत्रण में सहायता मिलती है। फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उन्हें हल, रोटावेटर, स्ट्रॉ रीपर या कल्टीवेटर की सहायता से मिट्टी में मिला देना चाहिए।
कपास को जड़ गलन रोग से बचने के लिए यह करें
Desi Cotton Sowing | कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि कपास में सबसे अधिक समस्या जड़ गलन रोग की होती है। इसलिए फसल को इस रोग से बचाना बहुत आवश्यक है। जड़ गलन रोग से पैदावार पर बहुत बुरा असर पड़ता है, क्योंकि इस रोग से पौधे मर जाते हैं।
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कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक जड़कनन रोग से बचने के लिए कपास की फसल में प्रति बीघा 6 किलो जिंक सल्फेट डालें। इससे कपास की फसल में जड़ गलन रोग नहीं लगेगा। वहीं जिन क्षेत्रों में जड़ गलन का प्रकोप ज्यादा है, वहां 2.5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा हरजेनियम को 50 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर मिट्टी में देना चाहिए। : Desi Cotton Sowing
किसानों को कृषि विभाग ने समसामयिक यह सलाह भी दी
कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि देसी कपास के साथ-साथ किसानों को इस समय अर्थात ग्रीष्म ऋतु में हरे चारे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए बाजरा की बुवाई प्रारंभ कर देनी चाहिए। वहीं बढ़ते तापमान को ध्यान में रखते हुए कद्दूवर्गीय सब्जियों जैसे लौकी, तुरई, करेला, खीरा, ककड़ी तथा भिंडी में शाम को सिंचाई करना अधिक लाभकारी होता है। क्योंकि इससे पानी का वाष्पीकरण कम होता है। : Desi Cotton Sowing
इधर इस समय जायद की भिंडी में ‘येलो वेन मोजेक (Yellow Vein Mosaic) ‘ रोग का प्रकोप देखा जाता है। इससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और फल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसके नियंत्रण के लिए फूल आने से पहले और बाद में प्रति लीटर पानी में 1 मिलीलीटर डाइमेथोएट 30 EC या 5 मिलीलीटर नीम तेल मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
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नमस्कार किसान साथियों….
मेरा नाम जयदीप मालवीय है और मैं एक कॉलेज छात्र हुं। मुझे 10वीं से ही खेती किसानी पर कंटेंट लिखने में गहरी रुचि है। साथियों, हम देखते है कि कई किसान भाइयों को खेती में कम उत्पादन एवं लागत ज्यादा आती है, जिससे उन्हें मुनाफा कम होता है। इसका प्रमुख कारण अभी भी खेती का परंपरागत तरीका अपनाया जाना है। किसान साथी खेती के परंपरागत तरीके से निकल कर आधुनिक तरीके अपनाएं, तभी खेती मुनाफे का सौदा साबित होगी। किसानों को नई नई जानकारी मिलते रहे और कम लागत में उनकी आय में बढ़ोतरी हो यही मेरा मकसद है। इसी को देखते हुए मैं डिजिटल वेबसाइट के जरिए किसानों को सटीक एवं सही जानकारी देने का प्रयास करता हुं। हमारा तरीका सरल और समझने योग्य होता है, ताकि हमारे किसान भाइयों को आसानी से अच्छी-अच्छी जानकारी मिलती रहे और उन्हें किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ ना हो। मैं पिछले 4 साल से किसानों के लिए कंटेंट लिख रहा हूं और यही चाहता हुं की मैं आगे भी ज्यादा से ज्यादा किसानों को नई नई जानकारी से अवगत करवाता रहूं।
आपके साथ के लिए धन्यवाद …





